(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.27. अध्यायः 027
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
गरुडस्य विनतां प्रति दास्यकारणप्रश्नः॥ 1 ॥ सर्पैः दास्यमोचनोपायकथनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-27-0x(104)(1396)
संप्रहृष्टास्ततो नागा जलधाराप्लुतास्तदा।
सुपर्णेनोह्यमानास्ते जग्मुस्तं द्वीपमाशु वै॥ 1-27-1(1397)
तं द्वीपं मकरावासं विहितं विश्वकर्मणा।
तत्र ते लवणं घोरं ददृशुः पूर्वमागताः॥ 1-27-2(1398)
सुपर्णसहिताः सर्पाः काननं च मनोरमम्।
सागराम्बुपरिक्षिप्तं पक्षिसङ्घनिजादितम्॥ 1-27-3(1399)
विचित्रफलपुष्पाभिर्वनराजिभिरावृतम्।
भवनैरावृतं रम्यैस्तथा पद्माकरैरपि॥ 1-27-4(1400)
प्रसन्नसलिलैश्चापि ह्वदैर्दिव्यैर्विभूषितम्।
दिव्यगन्धवहैः पुण्यैर्मारुतैरुपवीजितम्॥ 1-27-5(1401)
उत्पतद्भिरिवाकाशं वृक्षैर्मलयजैरपि।
शोभितं पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धतैः॥ 1-27-6(1402)
वायुविक्षिप्तकुसुमैस्तथाऽन्यैरपि पादपैः।
किरद्भिरिव तत्रस्थान्नागान्पुष्पाम्बुवृष्टिभिः॥ 1-27-7(1403)
मनःसंहर्षजं दिव्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम्।
मत्तभ्रमस्संघुष्टं मनोज्ञाकृतिदर्शनम्॥ 1-27-8(1404)
रमणीयं शिवं पुण्यं सर्वैर्जनमनोहरैः।
नानापक्षिरुतं रम्यं कद्रूपुत्रप्रहर्षणम्॥ 1-27-9(1405)
तत्ते वनं समासाद्य विजह्रुः पन्नगास्तदा।
अब्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगेश्वरम्॥ 1-27-10(1406)
वहास्मानपरं द्वीपं सुरम्यं विमलोदकम्।
त्वं हि देशान्बहून्रम्यान्व्रजन्पश्यसि खेचर॥ 1-27-11(1407)
सौतिरुवाच। 1-27-12x(105)
स विचिन्त्याब्रवीत्पक्षी मातरं विनतो तदा।
किं कारणं मया मातः कर्तव्यं सर्पभाषितम्॥ 1-27-12(1408)
विनतोवाच। 1-27-13x(106)
दासीभूतास्मि दुर्योगात्सपत्न्याः पतगोत्तम।
पणं वितथमास्थाय सर्पैरुपधिना कृतम्॥ 1-27-13(1409)
सौतिरुवाच। 1-27-14x(107)
तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेतरः।
उवाच वचनं सर्पांस्तेन दुःखेन दुःखितः॥ 1-27-14(1410)
किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम्।
दास्याद्वो विप्रमुच्येयं तथ्यं वदत लेलिहाः॥ 1-27-15(1411)
सौतिरुवाच। 1-27-16x(108)
श्रुत्वा समब्रुवन्सर्पा आहरामृतमोजसा।
ततो दास्याद्विप्रमोक्षो भविता तव खेचर॥ ॥ 1-27-16(1412)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सप्तविंशोऽध्यायः॥ 27 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-27-2 लवणं लवणासुरं पूर्वं ददृशुः॥ 1-27-8 मनःसंहर्षजं मनसः संहर्षाय जातम्॥ 1-27-15 लेलिहाः भोसर्पाः॥ सप्तविंशोऽध्यायः॥ 27 ॥


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